जीवात्मा परमात्मा का मिलन एक महायज्ञ।।

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Jeev Brahma Milan ek Mahayagya
Jeev Brahma Milan ek Mahayagya

जीवात्मा और परमात्मा का मिलन एक महायज्ञ।। Jeev Brahma Milan ek Mahayagya.

जय श्रीमन्नारायण,

मित्रों, परमात्मा से जीव का मिलन एक यज्ञ है। इस परमात्मा के मिलन रूपी यज्ञ में जीव अर्थात आत्मा यजमान है। श्रद्धा उसकी पत्नी एवं शरीर यज्ञ वेदी और फल है परमात्मा श्रीमन्नारायण से मिलन। परमात्मा से मिलन एक महानतम यज्ञ है। जीवात्मा और परमात्मा का मिलन एक महायज्ञ है। इस यज्ञ का फल जीव की चित्तशुद्धि है अर५थत होती है। इस चित्तशुद्धि का फल है परमात्मा की प्राप्ति है।।

इस यज्ञ में जीव के इस शरीर की सभी इन्द्रियाँ यज्ञमण्डप के द्वार हैँ। इस यज्ञ मेँ काम, क्रोध, लोभ, मोह आदि राक्षस बाधा करने के लिए आते है। इस यज्ञ मेँ विषय रुपी मारीच बाधा डालता है। परन्तु इन इन्द्रियों रूपी द्वार पर राम-लक्ष्मण अर्थात सत्संग और त्याग को स्थापित करने से काम, क्रोध, वासना रुपी मारीच, सुबाहु विघ्न डालने नहीँ आ पायेँगे। कदाचित यदि आ भी गये तो उनका नाश हो जायेगा और वे टिक नहीं पाएंगे।।

मित्रों, आँखो में, कानोँ मेँ, मुख मेँ, सभी इन्द्रियोँ के द्वार पर राम-लक्ष्मण रूपी सत्संग और त्याग को बैठाने से विषय रूपी मारीच विघ्न नही कर पायेगा। नहीं तो ये विषय वासना रुपी मारीच एक बार प्रवेश कर जाये तो ये शीघ्र मरता नहीं है। हम यदि अपनी प्रत्येक इन्द्रिय के द्वार पर ज्ञान रुपी राम और विवेक रुपी लक्ष्मण को अथवा सत्संग रूपी राम और त्याग रूपी लक्ष्मण तथा शब्द ब्रह्म एवं परब्रह्म को आसीन कर दें तो काम अर्थात मारीच यज्ञ में बाधा नहीँ डाल पायेगा।।

इसके बिना मानव जीवन रूपी यज्ञ निर्विघ्न समाप्त नहीं हो पायेगा। माया मारीच को भगवान श्रीरामचन्द्रजी विवेक रूपी बाण से मार डालते हैँ। जिनका चिँतन मात्र करने से काम का नाश हो जाता है। सिर्फ वही ईश्वर चिन्तनीय है।।

नारायण सभी का नित्य कल्याण करें । सभी सदा खुश एवं प्रशन्न रहें ।।

।। सदा सत्संग करें । सदाचारी और शाकाहारी बनें । सभी जीवों की रक्षा करें ।।

नारायण सभी का नित्य कल्याण करें । सभी सदा खुश एवं प्रशन्न रहें ।।

जयतु संस्कृतम् जयतु भारतम्।।

।। नमों नारायण ।।

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भागवत प्रवक्ता- स्वामी धनञ्जय जी महाराज "श्रीवैष्णव" परम्परा को परम्परागत और निःस्वार्थ भाव से निरन्तर विस्तारित करने में लगे हैं। श्रीवेंकटेश स्वामी मन्दिर, दादरा एवं नगर हवेली (यूनियन टेरेटरी) सिलवासा में स्थायी रूप से रहते हैं। वैष्णव धर्म के विस्तारार्थ "स्वामी धनञ्जय प्रपन्न रामानुज वैष्णव दास" के श्रीमुख से श्रीमद्भागवत जी की कथा का श्रवण करने हेतु संपर्क कर सकते हैं।।

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