प्रिया जूं के नाम की महिमा पर कृष्ण के विचार।।

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Priya Jun Ki Naam Mahima
Priya Jun Ki Naam Mahima

प्रिया जूं के नाम की महिमा पर कृष्ण के विचार।। Priya Jun Ki Naam Mahima.

जय श्रीमन्नारायण,

मित्रों, परम प्रिया श्री राधाजी के नाम की महिमा का गान करते हुए स्वयं हमारे प्रियतम श्री कृष्ण कहते हैं। किसी भी व्यक्ति के श्रीमुख से जिस समय मैं “रा” अक्षर सुन लेता हूँ उसी समय उसे अपना उत्तम प्रेमाभक्ति का दान कर देता हूँ। तथा जैसे ही कोई “धा” अक्षर का उच्चारण करे तब तो मैं मेरी प्रियतमा “श्रीराधाजी” का नाम सुनने के लिये उसके पीछे-पीछे ही चल देता हूँ।।

मुझे मेरी समस्त शक्तियों की प्रतिक मेरी परम प्रियतमा “श्रीजी” मुझे इतनी प्यारी हैं, कि उनका नाम लेनेवाले को मैं अपना सर्वस्व दे देता हूँ। ऐ मेरे प्यारे ये तेरी नजरों का करम है, जो हम जिंदा हैं। ये तेरी मुरली का करम है, जो हमें तेरी यादों में रखती है। ये तेरे अधर रस की कृपा है, जो हमारे अश्क रुकते ही नहीं।।

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मित्रों, एक बार की बात है, की श्री राधा नाम संकीर्तन करते समय किसी रसिक के ह्रदय मे बहुत ही सुंदर भाव का प्राक्ट्य हुआ। और भाव क्या था? भाव ये था, कि प्रिया-प्रियतम नित्य निकुंज में अपने दिव्य सिंहासन पर विराजमान है। और हमारे लाड़ले हमारे ठाकुर जी मधुर मधुर मुस्करा रहे हैं। उनकी मुस्कुराहट देख कर प्रिया जूं से रहा नही गया। और उन्होंने ठाकुर जी से पूछ ही लिया के सरकार आज आप इतना मुस्करा क्यों रहे हैं?।।

ठाकुर जी फिर भी मुस्कराए जा रहे थे। प्रिया जूं ने फिर पूछा सरकार बताइए तो कारण क्या है आपके मुस्कराने का? तब ठाकुर जी कहते हैं, कि राधा रानी मुस्कराने का कारण भी आप ही है। राधा रानी ने फिर पूछा, कि सरकार हम कैसे? तब ठाकुर जी कहते हैं, कि प्रिया जूं! आज धरती पर कुछ भक्त बैठकर आपके नाम का संकीर्तन कर रहे है।।

किशोरी जी ने कहा, कि अच्छा ये तो बहुत अच्छी बात है। पर सरकार ये तो बताइए कि कौन-कौन भक्त हमारे नाम का कीर्तन कर रहे हैं। उस समय वहाँ कीर्तन कर रहे हर भक्त का नाम ठाकुर जी ने किशोरी जी को बताया। कि कौन भक्त आपका नाम लेकर झूम रहा है कौन भक्त आपका नाम लेकर रो रहा है। अब बताइए क्या किशोरी जी को नहीं पता कि कौन उनका नाम जप कर रहा है?।।

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लेकिन किशोरी जी ने क्यों पूछा भक्तों के नाम? क्योंकि जिस जीव का नाम श्री ठाकुर जी के मुख से निकल जाये। उसका कल्याण तो निश्चित ही हो जाता है। इसीलिए प्रिया जूं ने ठाकुर जी के श्रीमुख से राधा नाम जपने वाले हर भक्त का नाम बुलवा दिया। यही तो है, श्री राधा नाम संकीर्तन की महिमा। राधे-राधे गाने वालों पर श्री ठाकुर जी की कितनी कृपा बरसवा देती है हमारी प्रिय जूं।।

वाह रे कान्हा तेरा करम, जब से तेरे भक्ति का रस पिया, मेरी कीमत है, कि कम होती ही नहीं है। दिनोंदिन बढ़ती ही चली जा रही है। हम तो तेरे कारण अनमोल हो गये प्यारे! इस कृपा को सदैव बनाये रखना, ताकि मैं तेरे नाम को कभी भूल से भी नहीं भूलूं।।

कभी तो आ भी जाओ प्रियतम ! क्योंकि प्यारे ! आपके बिना हमारा कोई आस्तित्व ही नहीं बचता ।।
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जय जय श्री राधे ।।
जय श्रीमन्नारायण ।।
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भागवत प्रवक्ता- स्वामी धनञ्जय जी महाराज "श्रीवैष्णव" परम्परा को परम्परागत और निःस्वार्थ भाव से निरन्तर विस्तारित करने में लगे हैं। श्रीवेंकटेश स्वामी मन्दिर, दादरा एवं नगर हवेली (यूनियन टेरेटरी) सिलवासा में स्थायी रूप से रहते हैं। वैष्णव धर्म के विस्तारार्थ "स्वामी धनञ्जय प्रपन्न रामानुज वैष्णव दास" के श्रीमुख से श्रीमद्भागवत जी की कथा का श्रवण करने हेतु संपर्क कर सकते हैं।।

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